फैमिली पैक

ज्यों तिल माँहीं तेल है, ज्यों चकमक में आग।
तेरा सांईं तुज्झ में, जाग सके तो जाग॥ 

नानक गुरू संतोखु रूखु, धरमु फुलु फल गिआनु।
रसि रसिआ हरिआ सदा, पकै करमि धिआनि।।

मेरा बैरी 'मैं' मुवा, मुझे न मारै कोय।
मैं ही मुझकौं मारता, मैं ही मारूं सोय॥ 

अत्त दीपो भव

मोकों कहाँ ढूँढे रे बन्‍दे, मैं तो तेरे पास में।
ना तो कौनों क्रिया करम में, ना ही योग बैराग में।। 

अभयंसत्‍वंसंशुद्धि

अनहद नाद

हम धूपबत्तियों की एक नयी परिभाषा लिख रहे हैं

बहुतेरे हैं घाट

लिखा-लिखी की है नहीं

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