धूप देने और दीपक जलाने का बहुत अधिक महत्त्व है।
विभिन्न सुगंधों वाली बाजारू धूप के निर्माण में ज्यादातर सस्ते हार्श केमिकल्स और काला पेट्रोलियम अवशेष प्रयोग किया जाता है। ये प्राकृतिक धूपबत्तियाँ उनसे किस प्रकार अलग हैं, इनको प्रयोग करने पर यह आपको पता चल जाएगा।

धूप देने का उचित तरीका:
धूप जलाकर आस-पास जल अर्पण किया जाता है। अँगुली से देवताओं को और अँगूठे से अर्पण करने से वह धूप पितरों को लगती है। जब देवताओं के लिए धूप दान करें, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश का ध्यान करना चाहिए और जब पितरों के लिए अर्पण करें, तब अर्यमा सहित अपने पितरों का ध्यान करना चाहिए तथा उनसे सुख-शांति की कामना करें।
सुबह दी जाने वाली धूप देवगणों के लिए और शाम को दी जाने वाली धूप पितरों के लिए होती है।
धूप देने के पूर्व स्थान की सफाई करनी चाहिए। पवित्र होकर ही धूप देना चाहिए। धूप ईशान कोण में ही दें। घर के सभी कमरों में धूप की सुगंध फैल जानी चाहिए।
धूप देने और धूप का असर रहने तक किसी भी प्रकार का संगीत नहीं बजाना चाहिए।

धूप के प्रकार:
• तंत्रसार में षोडशांग और मदरत्न में दशांग धूपों में प्रमुख: अगर, तगर, नागरमोथा, चंदन, इलायची, तज, जटामांसी, कर्पूर, गुग्गुल, जातीफल, और श्रीश ये धूप में श्रेष्ठ हैं।
• आरती या प्रार्थना के बाद कर्पूर वाली धूप से घर के वास्तुदोष ख़त्म होते हैं। साथ ही पैसों की कमी नहीं होती।
• गुग्गल की धूनी गृहकलह शांत करती है।
• घर में पैसा नहीं टिकता हो तो रोज़ाना महाकाली के आगे एक धूपबत्ती लगाएं। हर शुक्रवार को काली के मंदिर में जाकर पूजा करें।
• दशांग धूप उत्तम धूप है। इससे घर में शांति रहती है।
• गायत्री केसर: जावित्री, गायत्री केसर और गुग्गल की धूप 21 दिन तक करने से तंत्र बाधाएं दूर होती हैं।
'हेमाद्रि' द्वारा पौराणिक उल्लेख के अनुसार अमृत, अनन्त, अक्षधूप, विजयधूप, प्राजापत्य, वाली दशांग धूप का भी वर्णन है। 'भविष्य पुराण' का कथन है कि विजय धूपों में श्रेष्ठ है, लेपों में चन्दन लेप सर्वश्रेष्ठ है, सुरभियों (गन्धों) में कुमकुम श्रेष्ठ है, पुष्पों में जाती तथा मीठी वस्तुओं में मोदक सर्वोत्तम है। 'कृत्यकल्पतरु' ने इसे उदधृत किया है। धूप से मक्खियाँ एवं पिस्सू नष्ट हो जाते हैं।

घर पर धूप बत्ती बनाने की सामग्री: (1): गौ-गोबर पाउडर 100 ग्राम, (2): देवदारू काष्ठ चूर्ण 125 ग्राम, (3): नागरमोथा 125 ग्राम, (4): लाल चन्दन 125 ग्राम, (5): जटामासी 125 ग्राम, (6): कपूर कांचली 100 ग्राम, (7): राल 250 ग्राम, (8): घी 200 ग्राम, (9): चावल की धोवन 200 ग्राम, (10): चन्दन तेल या केवड़ा तेल 20 मिली. इन सभी को मिलाकर आटे की तरह गूँध लें, यहाँ ध्यान दें इसे गूँधने में जितनी ज्यादा मेहनत करेंगे परिणाम उतने ही अच्छे मिलेंगे अन्यथा बाद में जलाने से पहले इसे आकार देने के लिये हाथों में जब रगड़ते है तो यह बत्ती बनने की जगह फैल भी सकती है। अच्छी तरह गूँधने पर बाद में मनचाहे आकार की धूपबत्ती बना सकते है।

धूप जलाने के लाभ: पूजा धूप का उपयोग पर्यावरण को शुद्ध कर प्रदूषण-मुक्त करता है। इसके धुएं से वातावरण में फैले रोगाणु नष्ट होते है। धूप देने से मन, शरीर और घर में शांति की स्थापना होती है। रोग और शोक के प्रभाव दूर होते हैं। घर में व्याप्त सभी तरह की नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकल जाती है। ग्रह-नक्षत्रों से होने वाले छिटपुट बुरे असर भी धूप देने से दूर हो जाते हैं। धूप से पितृ तृप्त होकर मुक्त हो जाते हैं तथा पितृदोष का समाधान होकर पितृयज्ञ भी पूर्ण होता है। प्रतिदिन घर में, और कार्यस्थल पर धूप का उपयोग सकारात्मक शक्तियों को आकृष्ट करने में सहायक है।
सुगंध को दूर तक फैलाइए:

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धूपदान का मंत्र "वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः। आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्।।" कहता है कि हे प्रभु, यह वनस्पति के रस से बना, उत्तम सुगंध वाला धूप देवताओं को स्वीकार हो। तो फिर हार्श केमिकल्स और काले पेट्रोलियम अवशेष या बाँस निर्मित चीज़ें जलाने का कोई अर्थ नहीं है।

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